तीर्थ नगरी हरिद्वार में कई ऐसे स्थान हैं जिनका जिक्र धार्मिक ग्रंथों में मिलता है. यहां के कई मंदिरों की प्राचीनता आदि-अनादि काल की बताई जाती है. हरिद्वार में हरकी पौड़ी के साथ यहां स्थित हर धार्मिक मंदिर का अपना इतिहास है. हरिद्वार में ऐसा ही एक प्राचीन स्थान भी है, जहां भोलेनाथ ने समुद्र मंथन से निकला विष पिया था. इस स्थान पर शिव भक्त अपनी अनोखी मन्नत लेकर आते हैं. हरिद्वार में नील पर्वत पर मौजूद नीलेश्वर महादेव मंदिर देशभर में मशहूर है. इस पौराणिक स्थान पर कई घटनाओं के होने की बात सामने आती है. एक तरफ जहां भोलेनाथ के विष पीने की कथा प्रचलन में है, दूसरी कथा भगवान शिव और माता सती से जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि सावन की शिवरात्रि पर इस स्थान का सबसे अधिक महत्व होता है. जो शिव भक्त अपनी किसी भी मनोकामना को लेकर यहां पूजा अर्चना और भोले बाबा का अभिषेक करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग है.
नजीबाबाद रोड पर स्थित नीलेश्वर मंदिर के पुजारी राघव भारती बताते हैं कि यह मंदिर सतयुग के समय का है. इस स्थान का वर्णन स्कंद पुराण समेत कई धार्मिक ग्रंथों में किया गया है. भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष को पिया था. कालकूट विष को पीने के बाद भगवान शिव ने यहां से मणिकूट पर्वत पर जाकर आराम किया था, जहां आज विश्व प्रसिद्ध नीलकंठ महादेव मंदिर है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भोलेनाथ ने समुद्र मंथन से निकाला कालकूट विष पिया तो यहां के पर्वत और अविरल बहती गंगा की धारा नीली हो गई, इसीलिए आज भी शिवालिक के इन पर्वतों को नील पर्वत और गंगा को नील गंगा के नाम से जाना जाता है.
शिव लोक की प्राप्ति
पुजारी राघव भारती के अनुसार, नीलेश्वर महादेव मंदिर के बारे में दूसरी कथा का वर्णन भी आता है. इस स्थान से भगवान शिव का ससुराल दिखाई देता है. जब माता सती ने अपने प्राण त्यागे तो भगवान ने क्रोध में इसी स्थान पर अपनी जटा फटकार वीरभद्र को उत्पन्न किया था और दक्ष के यज्ञ को यही पर बैठकर विध्वंस किया. पुजारी राघव के मुताबिक, श्रावण मास में इस प्राचीन स्थान का महत्व और अधिक बढ़ जाता है. नीलेश्वर महादेव मंदिर में एक लोटा गंगाजल चढ़ाने से हजार गुना फल मिलता है. मंदिर का शिवलिंग स्वयंभू है, जो सतयुग के समय का है. यहां पूजा से शिव लोक की प्राप्ति होती है.





