जेनेवा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी एक हालिया और बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2050 तक कैंसर एक ऐसी महामारी का रूप ले सकता है जो कोरोना काल से भी अधिक विनाशकारी साबित होगी। आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दशकों में दुनिया की लगभग 92 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में इस बीमारी के चक्रव्यूह में फंस जाएगी, जिसमें कैंसर से जूझ रहे मरीज और चौबीसों घंटे उनकी सेवा में लगे देखभालकर्ता (केयरगिवर्स) दोनों शामिल हैं। यह भयावह आंकड़े साफ करते हैं कि कैंसर अब सिर्फ एक शारीरिक बीमारी नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा वैश्विक, सामाजिक और आर्थिक संकट बनने की कगार पर है।

हर पांच में से एक व्यक्ति को खतरा, युवाओं पर सबसे ज्यादा मार

विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों का अनुमान है कि दुनिया भर में हर पांच में से एक व्यक्ति अपने पूरे जीवनकाल में कभी न कभी कैंसर की चपेट में जरूर आएगा। वर्तमान आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2024 में ही वैश्विक स्तर पर कैंसर के 2.06 करोड़ (20.6 मिलियन) से अधिक नए मामले दर्ज किए गए हैं।

  • पुरुषों में स्थिति: पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर (16 लाख मामले) और प्रोस्टेट कैंसर (15 लाख मामले) सबसे ज्यादा देखा गया।

  • महिलाओं में स्थिति: महिलाओं में स्तन कैंसर (ब्रेस्ट कैंसर) के सबसे ज्यादा 24 लाख नए मामले सामने आए, जबकि फेफड़ों का कैंसर (10 लाख) और कोलोरेक्टल कैंसर क्रमशः दूसरे व तीसरे स्थान पर रहे।

सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि कैंसर अब असमय मौत (समय से पहले मृत्यु) का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है। साल 2024 में इस बीमारी से लगभग 97 लाख लोगों की जान गई, जिनमें से 48 लाख से अधिक लोग 30 से 69 वर्ष के कामकाजी और युवा आयु वर्ग के थे।

लाखों बच्चे हो रहे अनाथ, विकासशील देशों पर सबसे ज्यादा बोझ

इस जानलेवा बीमारी का असर केवल मरीजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ रहा है। हर साल दुनिया भर में 0 से 19 वर्ष के लगभग 4 लाख बच्चे और किशोर कैंसर की चपेट में आ रहे हैं, जिनमें से ज्यादातर गरीब देशों से हैं।

एक दर्दनाक आंकड़े के अनुसार, साल 2020 में कैंसर के कारण दुनिया भर के लगभग 24.5 लाख बच्चे अनाथ हो गए। इनमें से 10.4 लाख बच्चों के सिर से मां का साया उठ गया, जिसका सबसे बड़ा कारण महिलाओं में होने वाला स्तन और सर्वाइकल कैंसर रहा। वहीं 14.1 लाख बच्चों ने अपने पिता को खो दिया। इन अनाथ होने वाले बच्चों में से 40 प्रतिशत मामले भारत, चीन, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, इथियोपिया और पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों से हैं, जो इस संकट की असमानता को दर्शाता है। इसके अलावा, आधे से ज्यादा मरीज और उनके परिजन गंभीर मानसिक तनाव, अवसाद और सामाजिक अलगाव का सामना कर रहे हैं, जिससे कई परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह बर्बाद (चिकित्सा दिवालियापन) हो चुके हैं।

अमीर और गरीब देशों के बीच इलाज की गहरी खाई

अनुमान है कि साल 2050 तक दुनिया में कैंसर के मरीजों की संख्या 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 3.5 करोड़ (35 मिलियन) तक पहुँच जाएगी। इस वृद्धि की सबसे तगड़ी मार पिछड़े और गरीब देशों पर पड़ने वाली है, जहाँ सुविधाओं के अभाव में मामलों में 133 प्रतिशत तक का भारी उछाल आ सकता है।

रिपोर्ट अमीर और गरीब देशों के बीच इलाज के स्तर में मौजूद एक बहुत बड़े अंतर को भी उजागर करती है:

  • स्तन कैंसर: उच्च आय वाले अमीर देशों में स्तन कैंसर से पीड़ित 85 प्रतिशत महिलाएं इलाज के बाद कम से कम 5 साल तक जीवित रह जाती हैं, जबकि गरीब देशों में यह दर 45 प्रतिशत से भी कम है।

  • बच्चों का कैंसर: यूरोप में ब्लड कैंसर (लिम्फोइड ल्यूकेमिया) से पीड़ित 93 प्रतिशत बच्चे ठीक हो जाते हैं, जबकि अफ्रीका के कुछ हिस्सों में यह जीवन दर महज 19 प्रतिशत है।

इसकी मुख्य वजह यह है कि दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी के पास पैथोलॉजी और इमेजिंग जैसी बुनियादी जांच सुविधाएं तक नहीं हैं। उदाहरण के लिए, उप-सहारा अफ्रीका में हर 10 लाख की आबादी पर सिर्फ एक पैथोलॉजिस्ट उपलब्ध है, जबकि अमीर देशों में यह संख्या इससे 50 गुना ज्यादा है। जब तक इस वैश्विक अंतर को पाटा नहीं जाएगा, तब तक कैंसर के खिलाफ इंसानी जंग अधूरी ही रहेगी।