नई दिल्ली: लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान धनबल तथा अन्य अवैध हथकंडों के इस्तेमाल से जुड़े कानूनी मामलों में राज्य सरकारों के मनमाने रवैये पर अब अदालत का शिकंजा कस गया है। उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में तय किया है कि राजनेताओं या प्रत्याशियों पर दर्ज मुकदमों को हटाने के लिए अब संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय की मंजूरी अनिवार्य होगी। कोई भी राज्य सरकार बिना न्यायिक समीक्षा के अपने स्तर पर ऐसे मामले बंद नहीं कर पाएगी।
सत्ता परिवर्तन के बाद केस रफा-दफा करने के चलन पर ब्रेक
देश में अमूमन देखा जाता है कि सरकार बदलते ही नई सत्ता अपने दल के नेताओं, जनप्रतिनिधियों और प्रत्याशी रहे कार्यकर्ताओं पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की कवायद शुरू कर देती है। शीर्ष अदालत की इस नई व्यवस्था से इस राजनीतिक परिपाटी पर पूरी तरह अंकुश लगेगा। अब सिर्फ राज्य सरकार या सरकारी वकील की मंशा से केस खारिज नहीं होंगे, बल्कि उच्च न्यायालय यह जांच करेगा कि मामला वापस लेने का कोई ठोस और कानूनी आधार है भी या नहीं।
उच्च न्यायालय की अनुमति बिना नहीं हटेंगे आपराधिक मामले
अदालत ने साफ तौर पर रेखांकित किया कि दंड प्रक्रिया से जुड़ी धाराओं के तहत दर्ज मुकदमों को वापस लेने संबंधी किसी भी याचिका पर अंतिम फैसला हाई कोर्ट के पाले में होगा। जब तक उच्च न्यायालय केस के तमाम पहलुओं, साक्ष्यों और जनहित का सूक्ष्म अध्ययन करके अपना लिखित आदेश जारी नहीं करता, तब तक किसी भी नेता या प्रत्याशी के खिलाफ चल रहे मुकदमे समाप्त नहीं माने जाएंगे।
स्वच्छ राजनीति और जवाबदेही तय करने का प्रयास
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने और राजनीति में शुचिता कायम रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे न केवल दागी और गंभीर आरोपों से घिरे प्रत्याशियों को राजनीतिक लाभ मिलना बंद होगा, बल्कि अदालतों में लंबित जनप्रतिनिधियों के मामलों का पारदर्शी और निष्पक्ष निपटारा भी संभव हो सकेगा।





