जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता के गिरते स्तर के लिए विभागीय अधिकारियों को आड़े हाथों लेते हुए जोरदार फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश अजय माणिकराव खानविलकर व जस्टिस जेपी गुप्ता की युगलपीठ ने ओपन-कोर्ट में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालयीन आदेश-निर्देश का मजाक समझने का ढर्रा उचित नहीं। यदि 3 मई तक पूर्व आदेश का पालन सुनिश्चित कर प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया तो संबंधित अधिकारी अवमानन की कठोर कार्रवाई के लिए कमर कस लें।

मामला राज्य शिक्षा सेवा का गठन किए जाने के बावजूद एरिया एजुकेशन ऑफिसर्स यानी एईओ की नियुक्ति न किए जाने के रवैये को कठघरे में रखे जाने से संबंधित है। बहस के दौरान दलील दी गई कि मध्यप्रदेश शासन ने स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए केबिनेट आदेश के जरिए 6 जुलाई 2013 को राज्य शिक्षा सेवा के गठन का निर्णय लिया। जिसके तहत मैदानी स्तर पर गुणात्मक सुधार के लिए एईओ का महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद सृजित किया गया।

जिसकी विभागीय भर्ती सीमित परीक्षा के जरिए किए जाने का प्रावधान किया गया। इस कड़ी में 22 अगस्त 2013 को बाकायदे विज्ञापन निकाला गया। जिसके बाद 8 सितम्बर 2013 को ऑनलाइन फॉर्म भरवाकर सितम्बर 2013 में सफल अभ्यर्थियों का वेरीफिकेशन कराया गया। इसी बीच हाईकोर्ट में एक सैकड़ा याचिकाएं दायर हो गईं।

जिन पर 6 सितम्बर 2013 को अंतरिम आदेश के कारण भर्ती खटाई में पड़ गई। हालांकि 8 सितम्बर न्यायमूर्ति आलोक आराधे की एकलपीठ ने अपने आदेश के जरिए बाधा हटाते हुए एईओ नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया। जिसके आधार पर जनवरी 2015 में पुन: सत्यापन कराया गया। लेकिन इस बार अनुभव के अंकों के नाम पर जानबूझकर गड़बड़ी के जरिए नियुक्ति को झमेले में डाल दिया गया।

इस बीच गजटेड एचएम संघ ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। जिस पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एईओ नियुक्ति के सिलसिले में स्टे देने से इंकार कर दिया। इसके बावजूद राज्य शासन सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन होने का बहाना लेकर एईओ की नियुक्ति का टालने का ढर्रा अपना रखा है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत सिंह ने दलील दी कि राज्य शासन के इस रवैय को आड़े हाथों लेकर अवमानना कार्रवाई की जानी चाहिए।