
ग्वालियर । मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचारियों पर सरकार मेहरबान है, इसलिए यहां लगातार भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि हाल ही में नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट में भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई के जो आंकड़े जारी हुए हैं, वह चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020 की तुलना में 2021 में भ्रष्ट सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों के पकड़े जाने के मामले 65 प्रतिशत तक बढ़ गए। 200 सरकारी अधिकारी और कर्मचारी तो रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़े गए, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है- पूरे साल में एक भी भ्रष्टाचारी सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा। मध्य प्रदेश के पड़ोसी राज्य राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और देश के दूसरे राज्यों में भ्रष्ट वरिष्ठ अधिकारी भी जेल की हवा खा चुके हैं। भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई के लिए पूरे देश में एक ही कानून हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचारियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश न कर लोकायुक्त पुलिस और ईओडब्ल्यू (आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ) के अधिकारी खुद ही इन्हें नोटिस थमाकर छोड़ देते हैं। नतीजन- मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचारियों के हौंसले बुलंद हैं और जेल नहीं भेजे जाते। यही वजह है- भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है। विभागीय कार्रवाई में भी मप्र फिसड्डी: भ्रष्टाचारियों पर विभागीय कार्रवाई में भी मध्य प्रदेश फिसड्डी है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में किसी भी भ्रष्टाचारी को सेवा से बाहर नहीं किया गया। विभाग द्वारा किसी को दंड भी नहीं दिया गया।
तीन साल के आंकड़ों से समझिए... मध्य प्रदेश में किस तरह बढ़ रहा है भ्रष्टाचार:
1)- मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के मामले
वर्ष केस
2019 - 318
2020 - 151
2021 - 250
विश्लेषण: वर्ष 2019 की तुलना में भ्रष्टाचार के मामले कम हुए, जबकि 2020 की तुलना में मामले 65 प्रतिशत तक बढ़ गए।
2)- देश में भ्रष्टाचार के मामले में छठवें नंबर पर मप्र:
राज्य केस
महाराष्ट्र 773
राजस्थान 501
तमिलनाडु 423
कर्नाटका 360
उड़ीसा 265
मध्य प्रदेश 250
--दूसरे प्रदेशों में भ्रष्टाचारी पर कड़ा प्रहार, मप्र में एक भी नहीं गया जेल--
राज्य आरोपित
महाराष्ट्र 1080
राजस्थान 557
गुजरात 445
उत्तरप्रदेश 41
दिल्ली 282
मध्य प्रदेश 0
--भ्रष्टाचार के 584 मामलों में पड़ताल जारी--
रिपोर्ट के मुताबिक 2021 से पूर्व से भ्रष्टाचार के 529 मामले विवेचना में थे। 2021 में भ्रष्टाचार के 250 मामले दर्ज हुए, जिसमें से 195 मामलों में जांच एजेंसी ने चार्जशीट पेश की। 55 मामलों में विवेचना पूरी नहीं हो सकी। इस तरह अभी 584 मामले विवेचना में हैं। भ्रष्टाचार के 803 मामले अभी कोर्ट सुनवाई में हैं।
--कानून एक, कार्रवाई अलग-अलग--
- देश में भ्रष्टाचारियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की अलग-अलग धाराओं के तहत एफआइआर दर्ज होती है। सभी प्रदेश में लोकायुक्त, एंटी करप्शन ब्यूरो के अलावा सेंट्रल ब्यूरो आफ इंवेस्टिशन भी इसी धारा में एफआइआर दर्ज करती है।
- मप्र में लोकायुक्त और इओडब्ल्यू एफआइआर करने के बाद इस मामले में आरोपित को नोटिस थमाकर वहीं छोड़ देते हैं। जबकि सेंट्रल ब्यूरो आफ इंवेस्टिगेशन सीबीआइ कोर्ट में आरोपित को पेश करते हैं। राजस्थान में एंटी करप्शन ब्यूरो विशेष कोर्ट में आरोपित को पेश करती है। इसी तरह महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में किया जाता है।
- 2003 में मप्र में वाणिज्यकर अधिकारी ऋषभ कुमार जैन की मौत लोकायुक्त पुलिस की हिरासत में हो गई थी। इस मामले में तत्कालीन डीएसपी मोहकम सिंह मैन व तीन अन्य पुलिसकर्मियों को सजा हुई थी। इस मौत के बाद एक आदेश जारी हुआ और तभी से गिरफ्तारी बंद हो गई, हालांकि यह आदेश अस्थाई था।
--प्रदेश में ही जिलों में अलग-अलग कार्रवाई--
गिरफ्तारी ना करने के पीछे अब लोकायुक्त और इओडब्ल्यू के अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश का भी हवाला देते हैं कि सात साल से कम सजा वाले प्रविधान में आरोपित को नोटिस देकर छोड़ा जा सकता है। यह उदाहरण: सीबीआइ ने ग्वालियर में मिलिट्री इंजीनियर को 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़ा था। उसे भोपाल की विशेष कोर्ट में पेश किया और जेल भेज दिया गया, जबकि ग्वालियर में नगर निगम का तत्कालीन सिटी प्लान पांच लाख रुपये की घूस लेते इओडब्ल्यू ने पकड़ा था, उसे छोड़ दिया गया था।