मुंबई। हिंदी सिनेमा की वरिष्ठ अदाकारा शबाना आजमी हाल ही में अपने एक स्पष्ट बयान के चलते सुर्खियों में आ गई हैं। उन्होंने मजहब, निजी आस्थाओं और अपने जीवनसाथी व मशहूर गीतकार जावेद अख्तर की नास्तिक विचारधारा पर खुलकर अपनी राय साझा की। शबाना ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वे मुस्लिम हैं, लेकिन वे नियमित रूप से नमाज अदा नहीं करती हैं और धर्म उनके दैनिक जीवन का मुख्य हिस्सा नहीं है। उनके इस वक्तव्य के सार्वजनिक होने के बाद से ही इंटरनेट पर चर्चा का दौर शुरू हो गया है, जहां कुछ लोग उनके विचारों की सराहना कर रहे हैं तो कुछ उनकी आलोचना कर रहे हैं।

बचपन में नहीं था धार्मिक मान्यताओं का प्रभाव

एक बातचीत के दौरान शबाना आजमी ने अपने बचपन के दिनों और पारिवारिक वातावरण के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उनके पिता और जाने-माने शायर कैफी आजमी पूर्णतः नास्तिक थे, जबकि उनकी मां शौकत आजमी कुछ हद तक परंपराओं का पालन करती थीं, फिर भी घर में धर्म को लेकर कोई सख्ती नहीं थी। अभिनेत्री ने बताया कि सामान्य बोलचाल में उनके मुंह से 'माशाल्लाह' या 'इंशाल्लाह' जैसे शब्द निकल जाते हैं। इस पर उनके पति जावेद अख्तर अक्सर उनसे सवाल करते हैं कि जब वे धार्मिक नहीं हैं, तो इन शब्दों का प्रयोग क्यों करती हैं। शबाना का कहना है कि ये शब्द उनकी संस्कृति और भाषा का स्वाभाविक हिस्सा बन चुके हैं।

जावेद अख्तर की नास्तिक सोच और तर्क

अपने पति की विचारधारा पर बात करते हुए शबाना ने उन्हें एक दृढ़ नास्तिक बताया। उन्होंने साझा किया कि वे अक्सर जावेद अख्तर से पूछती हैं कि वे नास्तिकता को लेकर इतने मुखर क्यों रहते हैं। शबाना का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को पूजा-पाठ या इबादत से मानसिक शांति मिलती है, तो उसे इसकी पूरी छूट होनी चाहिए। इसके जवाब में जावेद अख्तर का तर्क रहता है कि जब धार्मिक सोच वाले लोग अक्सर नास्तिकों की भावनाओं की उपेक्षा करते हैं, तो एक नास्तिक को भी अपनी बात रखने का पूरा अधिकार होना चाहिए।

संस्कृति पसंद है लेकिन नमाज नहीं पढ़तीं

शबाना आजमी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे मुस्लिम पहचान से जुड़ी हैं और उन्हें ईद का त्योहार, उर्दू जुबान और खान-पान बेहद प्रिय है, परंतु वे नमाज नहीं पढ़ती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय होना चाहिए और इसमें किसी का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उनके इस बयान पर सोशल मीडिया यूजर्स की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, जिससे समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नास्तिकता और धार्मिक मान्यताओं को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है।