नई दिल्ली : जम्मू एवं कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने पर पाकिस्तान की खिंचाई करते हुए भारत ने मंगलवार को कहा कि यह इस्लामाबाद की एक कुटिल चाल है जो अब काम नहीं करेगी। 

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरूद्दीन ने कहा, 'हमने बार-बार कहा है कि हम एक ऐसी रूपरेखा में गंभीर बातचीत करना चाहते हैं जिसमें सभी मुद्दे शामिल हों।' प्रवक्ता ने कहा, 'पाकिस्तान द्वारा संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखा जाना एक सोची-समझी चाल है। इस चाल ने पहले भी काम नहीं किया है और अब भी नहीं करेगी।'

अकबरूद्दीन ने कहा कि बातचीत का माहौल तैयार करने की जिम्मेदारी अब पाकिस्तान पर है। उन्होंने कहा, 'शांति का रास्ता इस्लामाबाद से लाहौर और फिर नई दिल्ली आता है। इस रास्ते में कोई भी भटकाव एक कुटील चाल के रूप में देखी जाएगी।' अकबरूद्दीन ने जोर देकर कहा, 'यह रास्ता न्यूयार्क नहीं जा सकता। पाकिस्तान जिस तरह से काम कर रहा है, उससे यही लगता है कि वह कश्मीर मसले का समाधान लाहौर घोषणापत्र एवं शिमला समझौते के अनुरूप नहीं करना चाहता।'

ज्ञात हो कि कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप की मांग करने वाले पाकिस्तान को एकबार फिर अपने इस प्रयास में मुंह की खानी पड़ी है क्योंकि वैश्विक संस्था ने इस मुद्दे पर कोई भी नया जवाब देने के बजाय एक बार फिर यही दोहराया है कि इस विवाद का दीर्घकालिक हल निकालने के लिए भारत और पाकिस्तान को वार्ता के जरिए अपने मतभेद सुलझाने चाहिए।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सलाहकार सरताज अजीज ने भारत के साथ सीमा पर हालिया तनाव के बारे में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून को पत्र लिखकर संयुक्तराष्ट्र के हस्तक्षेप की मांग की थी। इस तरह पाकिस्तान ने कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की अपनी कोशिशों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

बान को लिखे पत्र में अजीज ने कहा कि पाकिस्तान का मानना है कि कश्मीर मुद्दे का शांतिपूर्ण हल निकालने के उद्देश्य को बढ़ावा देने में संयुक्तराष्ट्र और उसके ‘कार्यालय’ की एक अहम भूमिका है। बान के उपप्रवक्ता फरहान हक से कल जब बान से हस्तक्षेप की अपील करने वाले इस पत्र और इस मुद्दे पर उनके नजरिए के बारे में पूछा गया तो उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि वे पिछले सप्ताह बान के प्रवक्ता द्वारा जारी किए गए बयान का संदर्भ देंगे। उस बयान में संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने भारत और पाकिस्तान से कहा था कि उन्हें कश्मीर में दीर्घकालिक शांति एवं स्थिरता कायम करने के लिए अपने सभी मतभेदों को वार्ता के जरिए सुलझाना चाहिए।