बाड़मेर। शहरी निकाय चुनावों के संपन्न होने के बाद अब बाड़मेर का पूरा राजनीतिक ध्यान गांवों की सरकार यानी पंचायतीराज चुनावों पर केंद्रित हो गया है। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक तैयारियों में कांग्रेस से बढ़त बनाते हुए जिला परिषद के सभी वार्डों के लिए प्रभारियों की नियुक्ति कर दी है। इसके साथ ही पंचायत समिति वार्डों में भी प्रभारियों को जिम्मेदारियां सौंपी जा चुकी हैं और अब ग्राम पंचायत स्तर पर वार्ड प्रभारी नियुक्त करने की तैयारी चल रही है।
भाजपा की जमीनी तैयारियां और संभावित उम्मीदवारों के आवेदन
भाजपा ने वार्डवार जिम्मेदारियां तय करने के साथ ही व्यापक बैठकों का खाका भी तैयार कर लिया है। पार्टी स्तर पर संभावित प्रत्याशियों से आवेदन प्राप्त करने की प्रक्रिया भी अब अंतिम चरण में है। इन तमाम गतिविधियों से साफ संकेत मिलता है कि भाजपा चुनाव की औपचारिक घोषणा होने से पहले ही ग्रामीण क्षेत्रों में अपने संगठन को पूरी तरह सक्रिय और मजबूत करने में जुट गई है।
कांग्रेस की रणनीति और आंतरिक एकजुटता की कवायद
दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी ने भी पंचायतीराज चुनावों के मद्देनजर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी कार्यालय में उच्चस्तरीय बैठकें आयोजित कर संगठनात्मक गतिविधियों को गति देने की ठोस रणनीति बनाई गई है। बाड़मेर-जैसलमेर के सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल, बायतु विधायक हरीश चौधरी और जिलाध्यक्ष लक्ष्मणसिंह गोदारा लगातार क्षेत्रों के दौरे कर रहे हैं। हालांकि, कांग्रेस के सामने चुनावी तैयारियों के साथ-साथ संगठन के भीतर लंबे समय से चल रहे मतभेदों को पाटने की बड़ी चुनौती थी, जिसके तहत शिव के पूर्व विधायक अमीनखां और पूर्व जिलाध्यक्ष फतेहखां के बीच के मनमुटाव को भी दूर कर लिया गया है। अब कांग्रेस गुटबाजी को भुलाकर पूरी तरह एकजुटता के साथ चुनावी मैदान में उतरने की जुगत में है।
कांग्रेस का ऐतिहासिक गढ़ और भाजपा की सेंधमारी की कोशिशें
बाड़मेर के पंचायतीराज चुनावों का राजनीतिक इतिहास मुख्य रूप से कांग्रेस के पक्ष में ही झुका रहा है। जिले के अब तक के राजनीतिक सफर में कुल 12 जिला प्रमुख बने हैं और सभी के सभी कांग्रेस पार्टी से ही संबंधित रहे हैं। इतिहास में सबसे पहले वृद्धिचंद जैन ने जिला प्रमुख का पद संभाला था, जिसके बाद मदन कौर, गंगाराम चौधरी और लाधुराम विश्नोई ने दो-दो बार इस पद को सुशोभित किया। इसके अलावा मेहराराम चौधरी, राणा भवानीसिंह, बालाराम चौधरी, प्रियंका मेघवाल और वर्ष 2020 में महेंद्र चौधरी ने जिला प्रमुख की कमान संभाली। यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कारण है कि भाजपा इस बार कांग्रेस के इस पारंपरिक गढ़ में सेंध लगाने की पुरजोर रणनीति पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस के सामने अपने इस दशकों पुराने राजनीतिक वर्चस्व और प्रभाव को बरकरार रखने की कड़ी चुनौती है।
वर्ष 2020 के कड़े मुकाबले और बदले हुए समीकरण
पिछले पंचायतीराज चुनाव यानी वर्ष 2020 के परिणामों पर नजर डालें तो जिला परिषद की कुल 37 सीटों में से भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों ने 18-18 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी, जबकि एक सीट राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के खाते में गई थी। हालांकि आरएलपी ने भाजपा को समर्थन भी दिया था, लेकिन जिला प्रमुख के चुनाव के दौरान भाजपा के भीतर ही तीन सदस्यों द्वारा की गई क्रॉस वोटिंग के कारण बाजी कांग्रेस के हाथ लग गई थी। इस बार भी जिला परिषद की उन्हीं 37 सीटों पर दोनों प्रमुख दलों की पैनी नजर टिकी हुई है। विशेष बात यह है कि बाड़मेर से अलग होकर बालोतरा नया जिला बनने के बाद से क्षेत्र के भौगोलिक और राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं, जिससे इस बार का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने की उम्मीद है।





