गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित ऐतिहासिक मोढेरा सूर्य मंदिर ने अपने निर्माण के करीब 1000 वर्ष पूरे कर लिए हैं. अपनी अद्भुत वास्तुकला, बारीक शिल्पकला और खगोलीय महत्व के लिए प्रसिद्ध यह मंदिर गुजरात ही नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है. माना जाता है कि मंदिर का निर्माण 1026-27 ईस्वी के दौरान सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम के शासनकाल में कराया गया था क्योंकि सूर्यदेव सोलकी वंश के कुल देवता के रूप में पूजे जाते थे. इसलिए उन्होंने कुल देवता की पूजा के लिए भव्य मंदिर का निर्माण करवाया. मरु-गुर्जर स्थापत्य शैली में निर्मित इस मंदिर के तीन प्रमुख हिस्से-सूर्य कुंड, सभा मंडप और गर्भगृह हैं. ये तीनों हिस्से पूर्व से पश्चिम दिशा में एक सीधी रेखा में स्थित हैं. मंदिर की वास्तुकला में धार्मिक आस्था के साथ गणित और खगोलीय अवधारणाओं की झलक भी देखने को मिलती है. आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में खास बातें…
24 स्तंभों को दिन के 24 घंटों का प्रतीक
मंदिर के सामने स्थित सूर्य कुंड इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है. कुंड के चारों ओर छोटे-बड़े कुल 108 मंदिर बनाए गए हैं. इसके बाद सभा मंडप आता है, जिसकी दीवारों और 52 स्तंभों पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है. इन 52 स्तंभों को साल के 52 सप्ताहों से जोड़कर देखा जाता है. मंदिर के सबसे अंदरूनी हिस्से में स्थित गर्भगृह में कभी सूर्य देव की मुख्य प्रतिमा विराजमान थी. गर्भगृह में बने 24 स्तंभों को दिन के 24 घंटों का प्रतीक माना जाता है.
मोढेरा सूर्य मंदिर को लेकर मान्यता
मोढेरा सूर्य मंदिर को लेकर यह भी मान्यता है कि वर्ष के कुछ विशेष समय में सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचती थी. मंदिर की स्थापत्य योजना में सूर्य और प्रकाश के महत्व को विशेष रूप से स्थान दिया गया है. मंदिर की खासियत यह भी है कि जुड़ाव के लिए कहीं भी चूने का इस्तेमाल नहीं किया गया है. मकर संक्रांति के दिन देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक इस ऐतिहासिक स्थल को देखने पहुंचते हैं और मंदिर में बने सूर्यकुंड के पवित्र जल से स्नान भी करते हैं. भारत में केवल तीन जगहों पर ही सूर्य मंदिर हैं. पहला उड़ीसा का कोर्णाक मंदिर, दूसरा जम्मू में स्थित मार्तंड मंदिर और तीसरा गुजरात का मोढ़ेरा सूर्य मंदिर.
ब्रह्म पुराण और स्कंद पुराण में जिक्र
इस मंदिर को भीमदेव ने दो हिस्सों में बनवाया था, पहला गर्भगृह और दूसरा सभामंडप. सभामंडप में मौजूद 52 स्तंभों पर रामायण और महाभारत के चित्रों को खूबसूरती से उकेरा गया है. मोढ़ेरा की भूमि का जिक्र ब्रह्म पुराण और स्कंद पुराण में भी देखने को मिलता है. कहा जाता है रावण का संहार करने के बाद प्रभु राम ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए यहीं आए थे.
कला और सांस्कृतिक विरासत की भव्य पहचान
गुजरात सरकार की ओर से मंदिर परिसर में जनवरी में उत्तरार्ध महोत्सव का आयोजन भी किया जाता है. इसमें देशभर से आए कलाकार शास्त्रीय नृत्य और संगीत की प्रस्तुतियां देते हैं. मोढेरा सूर्य मंदिर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने दिसंबर 2022 में इसे विश्व धरोहर स्थलों की अस्थायी सूची में शामिल किया था. वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा मंदिर का संरक्षण किया जा रहा है. एक हजार वर्ष पूरे करने के साथ मोढेरा सूर्य मंदिर आज भी भारतीय स्थापत्य, कला और सांस्कृतिक विरासत की भव्य पहचान बना हुआ है.





